हाइलाइट्स
- सरकार गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम के नए वर्जन पर काम कर रही है
- पहली बार इसमें जूलर्स को शामिल करने की योजना पर विचार चल रहा है
- इस स्कीम का मकसद घरों में रखे सोने का कुछ हिस्सा यूज में लाना है
- अगस्त में आ सकता है गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम का नया वर्जन

ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक यह कदम सोने के आयात पर निर्भरता कम करने की सरकारी कोशिश का हिस्सा है। यह पहला मौका है जब इसमें जूलर्स को भी शामिल करने पर विचार किया जा रही है। माना जा रहा है कि इससे सुस्त पड़ी गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम स्कीम को बढ़ावा मिलेगा। सूत्रों ने बताया कि गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम के नए वर्जन की घोषणा अगस्त में होने की उम्मीद है।
सोने का आयात
सूत्रों को मुताबिक पिछले दो हफ्तों में सीनियर मंत्रियों और आरबीआई, बैंकों और इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों के बीच कई बैठकों के बाद इस प्रस्ताव को तेजी मिली है। इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि इसे फेस्टिव सीजन से पहले आगे बढ़ाया जा रहा है क्योंकि सोने की बढ़ती कीमतें और इंपोर्ट ड्यूटी में बढ़ोतरी जूलरी की मांग पर असर डाल रही हैं। मई में सोने का इंपोर्ट गिरकर लगभग 12 अरब डॉलर रहा।बुलियन इंडस्ट्री ने सरकार को कई उपाय सुझाए थे ताकि घरों में पड़े सोने को यूज में लाया जा सके। सोने के कारोबार से जुड़े एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि सरकार इस स्कीम में जूलर्स को शामिल करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। प्रस्तावित फ्रेमवर्क के तहत जूलर्स कलेक्शन और एग्रीगेशन पॉइंट के तौर पर काम करेंगे।
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जूलर्स का फायदा
वे पारदर्शिता और ट्रेसेबिलिटी सुनिश्चित करते हुए सोने को अधिकृत रिफाइनर्स और बैंकों तक पहुंचाएंगे। बदले में जूलर्स को सोना इकट्ठा करने, उसकी जांच करने, डिपॉजिट प्रोसेस करने और ट्रांजैक्शन में मदद करने के लिए सर्विस या हैंडलिंग फीस मिलने की उम्मीद है। सरकार ने 2015 में गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम शुरू की थी। ग्राहकों की हिचकिचाहट और ऑपरेशनल चुनौतियों के कारण यह योजना ज्यादा कामयाब नहीं हो पाई।क्यों फ्लॉप हुई स्कीम?
इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि 11 साल में यह स्कीम केवल 39 टन सोना ही बाहर निकाल पाई है। अब इसमें केवल एक से तीन साल की अवधि वाला शॉर्ट-टर्म बैंक डिपॉजिट विकल्प ही उपलब्ध है। मीडियम और लॉन्ग-टर्म डिपॉजिट स्कीम बंद कर दी गई हैं।हमारे देश में सोने को निवेश के बजाय एक संपत्ति के रूप में देखा जाता है और इससे लोगों के भावनात्मक लगाव होता है। यही वजह है कि लोग जूलरी बेचने से हिचकिचाते हैं। इस स्कीम के तहत मिलने वाला कम ब्याज भी लोगों को आकर्षित करने में नाकाम रहा।

लेखक के बारे मेंदिल प्रकाशदिल प्रकाश, नवभारत टाइम्स डिजिटल में असिस्टेंट एडिटर है। वह 20 साल से भी अधिक समय से पत्रकारिता से जुड़े हैं। इस दौरान उन्होंने खेल, राजनीति, संसद, विदेश, विज्ञान, रक्षा और बिजनेस जैसे कई विषयों पर रिपोर्टिंग की है। दिल प्रकाश पांच साल से भी अधिक समय से एनबीटी डिजिटल के साथ जुड़े हैं। इससे पहले वह देश की प्रमुख न्यूज एजेंसी यूनीवार्ता और बिजनेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं। साथ ही उन्होंने बीबीसी हिंदी में भी आउटसाइड कंट्रीब्यूटर के रूप में कई साल काम किया है। यूनीवार्ता में कई साल तक स्पोर्ट्स डेस्क पर काम करने के बाद नेशनल ब्यूरो में कई विषयों पर रिपोर्टिंग की। इस दौरान उन्हें हॉकी वर्ल्ड कप, क्रिकेट वर्ल्ड कप और कॉमनवेल्थ गेम्स को कवर करने का मौका मिला। साथ ही उन्होंने डिफेंस करेंसपोंडेंट कोर्स भी किया है। इस दौरान उन्हें रक्षा बलों के काम करने के तरीके को करीब से देखने का मौका मिला। दिल प्रकाश ने नई दिल्ली के भारतीय विद्या भवन संस्थान से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया है।... और पढ़ें





